गुरुवाक्य

Swamiji-2
ध्यानमूलं गुरुर्मूर्तिः
पूजामूलं गुरुर्पदम् ।
मन्त्रमूलं गुरुर्वाक्यं
मोक्षमूलं गुरुर्कृपा ॥
ध्यान का मूल गुरु की मूर्ति (चित्र) है ।
पूजा का मूल गुरु के चरण कमलों हैं ।
मन्त्र का मूल गुरु के शब्द हैं ।
मोक्ष का मूल गुरु की कृपा है ।
अर्थात् ऐसे परमगुरु परमात्मा का ध्यान ही सर्वध्यानों का मूल है, उनके चरण-कमलों की पूजा ही सर्वपूजा का मूल है। श्री गुरु देव के मुखारविन्द के वचन ही सर्व मंत्रों का मूल हैं। उनकी कृपा ही मोक्ष का मूल है।
 
 
 

कुंडलिनी एवं चक विज्ञान

ब्रिटेन में लन्दन के दैनिक जीवन में योग स्वामी महेश्वरानन्द आश्रम के दसवें स्थापना दिवस पर सप्ताह भर आयोजित दैनिक जीवन में योग संगोष्ठी में १९ से २१ तारीखों में पुण्यात्मा आबूनाथ स्वामी महेश्वरानन्द जी का भी आशीर्वाद प्राप्त करने का सौभाग्य मिला । इस संगोष्ठी में ब्रिटेन सहित संसार के अनेक देशों से आये लोगों ने भाग लिया। सभी ने क्रियात्मक कार्यशिविर, सान्ध्यकालीन उद्बोधक भाषण एवं आध्यात्मिकता से पूर्ण सत्संगों का आनन्द लिया। इनमें कुण्डलिनी एवं चक्रविज्ञान पर विशेष बल दिया गया था।

श्री महाप्रभुजी के मानव हितकारी अमूल्य सरल उपदेश

  1. ईश्वर की भक्ति सच्चे हृदय से करो।
  2. नीति, धर्म की दासी है। धर्म का पालन करने के लिए मानव को नीतिवान होना चाहिये तथा जीवन-पर्यन्त नीति पर ही चलना चाहिये।
  3. जो कार्य करना चाहो, उसे दृढ़ निश्चय एवं आत्म-विश्वास से करो। ऐसा करने पर आपको निश्चित रूप से सफलता मिलेगी।
  4. सदैव भलाई का काम करो। बुराई पर कभी ध्यान मत दो।
  5. कार्य प्रारम्भ करने के पश्चात् उसे बीच में ही मत छोडि़ए। उत्तम कार्य में सदैव कठिनाईयाँ आती ही रहती हैं। इनसे घबरायें नहीं। जिस प्रकार सुन्दर व सुगन्धित गुलाब का फूल काँटों से घिरा रहता है ठीक उसी प्रकार उत्तम कार्यों में भी कठिनाइयाँ होती हैं। इन कठिनाई रूपी काँटों को दूर करके मार्ग साफ करने के पश्चात् अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहें।
  6. किसी की मदद पर आधारित मत रहो, स्वावलम्बी बनो। अपनी शक्ति पर पूर्ण विश्वास रखो। परमात्मा अवश्य ही तुम्हारी मदद करेगा।
  7. अपने व्यवहार में सदैव बहादुर बने रहो। कभी भी हिम्मत मत हारो।
  8. कुछ लोग अपने शरीर की बाहरी स्वच्छता तो रखते हैं, किन्तु आन्तरिक रूप से स्वच्छ नहीं रहते। आन्तरिक स्वच्छता से ही मन शुद्घ होता है। अत: बाहरी स्वच्छता के साथ ही आन्तरिक स्वच्छता भी अनिवार्य है।
  9. सच बोलने से मत डरो, मन मे पाप मत रखो। सत्य की सदैव विजय होती है।
  10. जीवों पर दया करो, मगर कोई तुमसे सहायता माँगे तो उदार हृदय से उसकी सहायता करो। लोगों की भलाई में अपनी भलाई समझो।
  11. सदैव नम्र रहो, किसी बात पर अभिमान मत करो। सभी के साथ अपनत्व की भावना रखो।
  12. जो कुछ भी तुम अपना समझते हो, वह तो क्षणभंगुर है। संसार में तुम ही सब कुछ नहीं हो। यहाँ पर तुमसे भी अच्छे अनेक हैं, अत: किसी बात पर अपना अहसान मत दिखाओ।
  13. सदैव ईमानदार बनो, ईमानदारी कुछ नहीं माँगती। बेईमान मनुष्य को दर-दर की ठोकरें खानी पड़ती हैं। अन्त में बेईमान मनुष्य सदैव हारता है।
  14. स्वयं की प्रशंसा कभी मत करो। अगर सदकार्य करोगे तो अन्य लोग तुम्हारी प्रशंसा करेंगे। तुम्हारी महानता इसी में है।
  15. दु:ख से घबराओ मत। सुख और दु:ख तो जीवन रूपी गाड़ी के दो पहिये हैं। जो दु:ख से घबरा जाता है वह जीवन में कभी सफल नहीं हो सकता है। निर्भय बनकर आत्म-विश्वास के साथ कार्य करो।
  16. आज का कार्य आज ही करो, उसे कल पर मत छोड़ो। दान अथवा सदकार्य करने में ढील मत करो। प्रत्येक समय किसी भी मनुष्य के लिए एकसा नहीं रहता है। समय परिवर्तनशील है।
  17. सबको समान दृष्टि से देखने और उनका भला करने से ही तुम्हें सच्चे सुख का आभास होगा। यदि तुम्हारा जीवन भलाई में न बीता तो ऐसा जीवन व्यर्थ है।
  18. मानव मात्र की सेवा ही सच्चा सुख है। आनन्द व सुख कभी स्थायी नहीं रहते । अत: जीवन में आनन्द व मौज-मस्ती उड़ाने की बात कम सोचते हुए उच्च ज्ञान प्राप्त करना और सच्चा साधारण जीवन जीना ही वास्तविक मंजिल की ओर बढऩा है।
  19. इस अमूल्य समय को व्यर्थ मत खोओ। जिन्दगी का हर क्षण बहुत कीमती है। बीता हुआ समय कभी वापिस नहीं लौटता। समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता है। अगर समय के साथ नहीं चले तो तुम औरों से बहुत पीछे रह जाओगे। अत: समय का सदुपयोग करो।
  20. अच्छाइयाँ व बुराइयाँ प्रत्येक मनुष्य में होती हैं। तुम बुराइयों को ग्रहण मत करो। प्रत्येक मनुष्य से अच्छे गुण सीखो उसके दोषों पर ध्यान मत दो। प्रत्येक मनुष्य में शिक्षा योग्य कुछ न कुछ गुण अवश्य होते हैं।
  21. बुरी आदत मत डालो। एक बार बुरी आदत डालने से वह जल्दी नहीं छूटती। बचपन से ही अच्छी आदतें सीखने का प्रयास करना चाहिये।
  22. बचपन की सुन्दर आदतें जिन्दगी भर काम आयेगी। बुरी आदतों से सुन्दर जिन्दगी का सत्यानाश हो जाता है। तम्बाकू, भाँग, गाँजा, अफीम और शराब इत्यादि मादक द्रव्यों के सेवन से दूर रहें। इन व्यसनों से सैकड़ों बीमारियों को खुला निमन्त्रण मिलता है।
  23. प्रतिदिन सूर्योदय होने से पहले बिस्तर त्याग दें। प्रात: कालीन समय में नित्य स्नान करें, स्वच्छ कपड़े पहनें। थोड़ा भोजन करें, अधिक भोजन करने से स्वास्थ्य खराब हो जाता है।
  24. माता-पिता एवं गुरुजनों की आज्ञा का पालन करें। अपने छोटे भाई-बहिनों के साथ आदर व प्रेम से रहें।
  25. किसी से गपशप नहीं करें। तुम्हारी कथनी व करनी में अन्तर नहीं होना चाहिये। सदैव अच्छी व मीठी बोली बोलो।
  26. अपनी सच्ची बात पर अटल रहो। किसी के साथ किये गये वचन को अन्त तक निभाने का प्रयास करो।
  27. पच्चीस वर्ष तक की उम्र तक ब्रह्मचर्य का पालन करो। विवाहोपरान्त अपनी अर्धांगिनी के साथ उत्तम व्यवहार करो, पर स्त्री पर कुदृष्टि मत डालो।
  28. किसी पराई स्त्री के साथ एकान्त व अकेले में मत बैठो। उसके अंगों व वस्त्रों पर नजर मत रखो।
  29. अपनी इच्छाओं व भूख पर मर्यादा का अंकुश रखो। उनके अधीन न होकर सच्चा जीवन जीने का प्रयत्न करो।
  30. प्रथम मुलाकात में ही किसी पर विश्वास मत करो। पहले उसकी परख करो। कहीं ऐसा न हो कि किसी ढोंगी व लफंगे की बातों में आकर उस पर विश्वास कर बैठो और बाद में नुकसान उठाना पड़े।
  31. मित्र को अधिक व असमय पर व्यर्थ ही धन-सम्पत्ति उधार मत दो, क्योंकि अगर वह सही समय पर लौटा नहीं सका तो आपकी सच्ची मित्रता में दरार पड़ जायेगी।
  32. धन का व्यर्थ ही संग्रह मत करो। खर्च, जमा अथवा दान करके धन का सदुपयोग करो। लक्ष्मी को कैद करके रखने से वह नाराज हो जाती है। व्यर्थ ही जमा किया हुआ धन भी चिरकाल तक नहीं रहता।
  33. दूसरों को उपदेश देने से पहले अपने आपको देखो। ऐसा कार्य न करें। जिससे कि बाद में अपनी बात बदलनी पड़े या स्वाभिमान को छोडऩा पड़े, लोगों से द्वेष करना पड़े और ढोंग रचना पड़े।
  34. ज्ञान एक अनन्त सागर है, उसमें गोते लगाते रहो। समय तीव्र गति से भाग रहा है, जीवन अत्यन्त लघु है, अनुभव कम व सच्चा, न्याय दुर्लभ होता जा रहा है, भूतकाल बीत गया। वर्तमान भी बीत जायेगा। अत: नींद को तजो, उठो व अपने कर्तव्य को समझो।
  35. व्यर्थ ही किसी से झगड़ा मोल मत लो। सदपुरुषों की संगत करो। पाप से बचो। किसी के समक्ष अपने दु:ख का रोना बार-बार प्रदर्शित मत करो। जुआ मत खेलो। माता-पिता एवं गुरु की निन्दा मत करो तथा मत सुनो। किसी से कठोर वचन मत बोलो।
  36. विषय-वासना में अधिक समय नष्ट मत करो। जिस प्रकार एक विशालकाय हाथी, कागज की हथिनी के जाल में फँस जाता है, पुष्प को देखकर भ्रमर दीवाना हो जाता है, दीये की लौ से पतंगा जलकर अपना जीवन नष्ट कर देता है, वैसे ही पुरुष भी स्त्री के प्रेम में दीवाना होकर जीवन व्यर्थ ही नष्ट कर देता है। क्षणिक सुख के लिए वह इस जाल में फँस जाता है। ज्ञान की बातें न करके मिथ्या प्रलोभन की बातें करता है, ऐसा मनुष्य सठ कहलाता है।
  37. सृष्टि के नियमों के विरुद्घ कोई कार्य मत करो, अगर ऐसा कार्य किया तो प्रकृति स्वयं आपसे बदला ले लेगी।
  38. जहाँ तक सम्भव हो प्रत्येक व्यक्ति को समाज में नैतिक भावना को जाग्रत करना चाहिये जिससे मानव समाज का कल्याण हो सके।
  39. प्रत्येक मनुष्य को वैदिक विभूतियों, ऋषि-मुनियों, देशभक्तों एवं राष्ट्रीय ऐतिहासिक पुरुषों की जीवन गाथा का अध्ययन करके प्रेरणा लेनी चाहिये। जीवन को अच्छा अथवा बुरा बनाना प्रत्येक मानव के हाथ की बात है।
  40. जो व्यक्ति ब्रह्म-ज्ञान की बातें बहुत करता है परन्तु स्वयं सच्चाई व ब्रह्मज्ञान की बातों पर अमल नहीं करता, पराधीन है तो पढ़ा-लिखा होकर भी मूर्ख कहलाता है।
  41. जो व्यक्ति संसार को त्याग कर संन्यासी वेष तो धारण कर लेता है परन्तु आत्म-शुद्घि नहीं करता है और न ही अपने जीवन में कोई शुभ कार्य करता है, उसका जीवन ही व्यर्थ है।
  42. जिस स्थान पर आपका आदर-सत्कार न हो उस स्थान पर पाँव भी नहीं रखना चाहिये।
  43. आलस्य मनुष्य का शत्रु है। आलसी मनुष्य अपनी इष्ट सिद्घि प्राप्त नहीं कर सकता। अत: प्रत्येक मनुष्य को आलस्य त्याग कर फुर्तीला रहना चाहिये।
  44. धन और वचन से इस संसार में समस्त कार्य सम्भव हैं। अत: तुम्हें सात्विक रीति से धन कमाना चाहिये। इसी से तुम्हारा यश सर्वत्र फैलेगा।
  45. केवल दान लेना ही मत सीखो, बल्कि दान देना भी सीखो। अधिक दान लेने से बोझ से तुम कभी उऋण नहीं हो सकते। अत: दान देकर अपने को हल्का अनुभव करो।
  46. प्राणी मात्र पर दया करो। जो हिंसक होता हैं, उसकी स्वयं की भी कभी भी हिंसा हो सकती है। उदाहरणार्थ -- सिंह भी हिंसक होता है लेकिन कभी-कभी वह भी मारा जाता है अथवा पिंजड़े में बन्द कर दिया जाता है बुरे कार्य का परिणाम भी अन्त में बुरा होता है।

गुरु कैसा है

ॐ ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिम् ।

द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम् ॥

एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतम् ।

भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि ॥

 

यह श्रीगुरुगीता का ५२ श्लोक है जो स्कंद पुराण से लिया हुआ है।

 

जो ब्रह्मानंदस्वरूप हैं, परम सुख देनेवाले हैं जो केवल ज्ञानस्वरूप हैं, (सुख, दुःख, शीत-उष्ण आदि)
द्वन्द्वों से रहित हैं, आकाश के समान सूक्ष्म और सर्वव्यापक हैं,
तत्वमसि आदि महावाक्यों के लक्ष्यार्थ हैं,
एक हैं, नित्य हैं, मलरहित हैं, अचल हैं, सर्व बुद्धियों के साक्षी हैं,

भावना से परे हैं, सत्व, रज और तम तीनों गुणों से रहित हैं ऐसे श्री सदगुरुदेव को मैं नमस्कार करता हूँ | (५२)

गुरु ही ब्रह्मा है

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वर: ।

गुरु:साक्षात् परब्रह्म  तस्मै श्रीगुरवे नम: ॥

 

गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है, गुरु महेश्वर शिव भी है।
गुरु ही वस्तुत: परब्रह्म परमेश्वर है, ऐसे श्री गुरुदेव के प्रति मेरा नमन है ।
अर्थात्
सर्वात्मा अन्तर्यामी एक ही परब्रह्म सत्ता है तथा वही ब्रह्म रूप होकर सृष्टि तथा वेदों की रचना करता है, वही विष्णुहोकर विश्व का पालन पोषण करता है। धर्मरक्षार्थ अवतार धारण करता है। वही रौद्र रूप से सृष्टि का प्रलय संहार करता है। वही परब्रह्म परमात्मा मोक्ष इच्छा वाले मुमुक्षुओं को मुक्ति देने के लिए आत्मज्ञान के दाता, सतगुरु रूप में अवतार धारण करते हैं।