पद राग गजल चोबोला नं॰ ६७

अनुभव का डंका स्वामी ने, बजवा दिया अनहद बेगम में॥टेर॥

वहां नहीं रंग रुप नहीं माया, सतगुरु आप अजाया रे।
नहीं है वहां पर आना जाना, नहीं कर्म नहीं काया है॥१॥

माया का वहां लेश नहीं, प्रवेश कुछ नहीं पाया है।
नहीं सगुण निर्गुण दोनों वहां पर, नहीं नाम रुप नहीं छाया है॥२॥

सत्य असत्य कहना नहीं कोई, नहीं कहन कथन में आया है।
निराकार सू न्यारा कहिये, अपरम रुप अथाया है॥३॥

वहां नहीं ज्ञान ध्यान नहीं पहुँचे, नहीं जपने में आया है।
स्वामी दीप सतगुरु की शरण अलख पलख समझाया है॥४॥